Thursday, August 13, 2009

सोचते और जागते

सोचते और जागते साँसों का एक दरिया हूँ मैं
अपने ग़ुमगश्ता किनारों के लिए बहता हूँ मैं

जल गया सारा बदन इन मौसमों की आग में
एक मौसम रूह का है जिसमें अब ज़िंदा हूँ मैं

मेरे होटों का तबस्सुम दे गया धोका तुझे
तूने मुझको बाग़ जाना देख ले सेहरा हूँ मैं

देखिए मेरी पज़िराई को अब आता है कौन
लम्हा भर को वक़्त की दहलीज़ पर आया हूँ मैं

-- अथर नफ़ीस

भाषांतराचा प्रयत्न :

चिंतनी जागेपणी श्वाससरिता होय मी
लुप्त काठांसाठीच माझ्या वाहतोय मी

पोळली सारी तनू ह्या ऋतूवणव्यांमधे
एक आत्म्याचा ऋतू ज्यामधे जगतोय मी

भुलविले तुज माझिया सुस्मिताने ओठच्या
मी नव्हे राई, पहा कोरडा निष्तोय मी

माझियाता स्वागता कोण ये पाहा जरा
उंबर्‍यात काळाच्या निमिषभर आलोय मी

3 comments:

  1. It is a very good attempt..but I think it is missing something..probably the beauty of the original urdu poetry..shabdancha artha toch utarla aahe..pan saundarya nahi utarlay...bhashanatarachi limitation asavi ti...

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  2. Bhaari marathi for me...ardhe karalech nahi....but i liked the translation of the last verse, and the use of Nimish in it. It is really hard to translate something and have your own takhallus in it.

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  3. सहिच रे!! आवडलं आपल्याला. उर्दूपेक्षा मी ते मराठी ओळी बोलण्यात पण वापरू शकेन ईतक्या सोप्या झालेत.

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