Tuesday, June 7, 2011

आज की कविताएँ

१.

जब आँख़ें खुली होती हैं
और दिखाई देते हैं कुछ मंज़र
जो मेरी दुनिया में तब के अलावा
और कभी कहीं भी दिखते नहीं हैं
तब मेरा ख़्याल है वक़्त का वह  दौर होता है
जब चाँदनी से बचने के लिये मैंने
बदन पर चादर ओढ़ी होती है
इस डर में कि कहीं वह गिर कर
इस बदन को ख़ूबसूरत न कर दे

जब आँख़ खुलती है
तब डर जाता हूँ यह देख कर
कि मंढ़राते हुए संकट जैसा
सूरज छाया हुआ है पूरे आसमान पर
और मैं दुआ कर रहा हूँ
कि मुझमें ऐसी ताकत आ जाये
कि मैं उसे श्राप दे सकूँ -
तोहे राहू लागे बैरी
यह डर तो रोज़ का है
रोज़ के साथ वह भी आ जाता है

२.

ऐसा कुछ भी तो नहीं है
जो किसी ख़ास समय पर होता हो 
जिस के लिए मेरा उधर होना ज़रूरी हो
और जो मेरे बग़ैर शुरू भी ना हो

घड़ी में झाँक कर देखता हूँ
तो पता चलता है कि समय क्या हुआ है

वरना ऐसा कोई भी तो नहीं
जो किसी ख़ास समय पर
मुझसे मिल ने आये
या मुझसे बात करे
मुझे कुछ काम दे
मुझसे कुछ माँगे

कुछ आवाज़ भी तो नहीं यहाँ
जो समय की सूचना दे मुझे

मैं उठता हूँ तो भूख़ लगती है मुझे
और सोता नहीं हूँ तब तक
जब भी सोचता हूँ
तब तब भूख़ लगती है मुझे
अब उसका भी कोई
ख़ास वक़्त नहीं है

यहाँ कुछ भी तो नहीं है
जो समय का पाबंद हो
बस दो चीज़ें हैं
जो समय के साथ
हर दम हर कदम चल रही हैं
एक उसकी रवानी
और दूसरी मेरी हैरानी

कोई ऐसा भी तो नहीं
जो बेवजह आए और
घड़ी भर के लिए
घड़ी को भुलाने की वजह बन जाए

मैं घड़ी में झाँक कर देखता हूँ
तो पता चलता है कि समय क्या हुआ है
वरना इस सन्नाटे में
बिन बताए
वक़्त तो सिर्फ़ जाता सुनाई देता है