Sunday, April 16, 2017

बहार आयी

बहार आयी तो जैसे यक बार
लौट आये हैं फिर अदम से
वो ख़्वाब सारे, शबाब सारे
जो तेरे होटों पे मर मिटे थे
जो मिट के हर बार फिर जिये थे
निखर गये हैं गुलाब सारे
जो तेरी यादों से मुश्कबू हैं
जो तेरे उश्शाक़ का लहू हैं

उबल पड़े हैं अज़ाब सारे
मलाल-ए-अहवाल-ए-दोस्तां भी
ख़ुमार-ए-आग़ोश-ए-महवशां भी
ग़ुबार-ए-ख़ातिर के बाब सारे
तेरे हमारे
सवाल सारे, जवाब सारे
बहार आयी तो खुल गये हैं
नये सिरे से हिसाब सारे

- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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मोहोरताना जणू एकवार
फिरून आली आदमकाळची
स्वप्नील सळसळ नवयौवनाची
अधरांवर जी तुझ्या उधळली
मिटून दर वेळी पुन्हा उमलली
फुलून आले गुलाब सारे
तुझ्या स्मृतींचा सुगंध ल्याले
प्रीतीत तुझिया आरक्त झाले

उमळून आल्या सगळ्या व्यथाही
नि मैत्रीमधल्या कटू कथाही
प्रियामिठीची नि ती खुमारी
सचिंत हृदयीची शल्यं सारी
तुझे नि माझे
सवाल सारे, जबाब सारे
मोहोरताना पुन्हा मांडले
नव्या दमाने हिशोब सारे


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